उपदेश

है निशा का राज, दिख पडता नहीं कोई बसेरा।
और इस सुनसान पथ पर चल रहा कोई अकेला।
पर तभी सम्मुख खडा, है कोई भिक्षु जान पडता,
जो अंधेरे में हमेशा हीं अकेले भ्रमण करता।

भिक्षु ने भाँपी पथिक के क्षुब्ध मन की दशा सारी,
पूछा- किस कारण पथिक, है ये तुम्हारा हृदय भारी?
कौन से गन्तव्य है जाना तुम्हें कुछ तो बताओ,
लो क्षणिक विश्राम, निज मन की व्यथा मुझको सुनाओ।

पथिक बोला-
कर न पाया कुछ भी पूरा, मैं तुम्हें क्या क्या बताऊँ।
हैं सभी किस्से अधूरे, कौन सा तुमको सुनाऊँ।
देख ना पाओगे, है तस्वीर काली रात सी
अनगिनत चेहरे हैं मेरे, कौन सा तुमको दिखाऊँ?

सूर्य की पहली किरण के साथ ही आया था मैं।
तेज और पुरुषार्थ सारा साथ ही लाया था मैं।
हिम शिखरों सा था आया, अब मैं दावानल सा हूँ।
पतन की कह कर कथा मैं क्यूँ व्यथा तुमको जलाऊँ।

आया तो था स्वर्ग की आभा धरा पर खींच लाने,
प्रेम और समभाव का संदेश दुनिया को बताने।
लोभ और लालच के झांझावात में पर फंस गया,
पथभ्रमित मारा फिरा हूँ मैं तुम्हे पथ क्या दिखाऊँ?

इन भुजाओं की शिलाओं में जगाया जोश इतना,
लोहू को लावा बना दे धमनियों में रोश इतना।
पर सका ना सीख खुद को बाँधना और शांत होना,
जय किया खुद को कभी ना जय कथा मैं क्या सुनाऊँ?

जग विजय की योजनाओं में है मेरी रात गुजरी,
इन्द्रियों की लालना में हर अन्धेरी रात गुजरी।
सत्य को खोजूँ कभी सपने में भी सोचा नहीं जब
तो किया निर्माण ना निर्वाण पथ मैं क्या बताऊँ?

पर समय बलवान सबसे कौन जो इससे बचा है,
नियती ने जाने हृदय में कौन सा जादू रचा है,
जीतने को था जिसे मैं जन्म से उद्विग्न हर पल,
जीत कर उसको तनिक भी हर्ष जाने क्यूँ न पाऊँ।

भिक्षु बोला-
हो रही है तात, इक नयी प्रात, कल की बात छोडो।
जिंदगी आगे खडी है, आज उससे मुख ना मोडो।
जो किये हैं भूल कोई और उनको ना करे फिर,
आज कर लो प्रण रणों की रीति दुनिया से मिटओ।

तुम करो उद्घोष ऐसी जो धरा में गूँज जाये,
हर जगह रण पीडितों को कष्ट से मुक्ति दिलाए।
प्रेम और समभाव की चहुँओर जय-जयकार हो फिर,
धर्म की ऐसी अनोखी बात दुनिया को बताओ।

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